Saturday, May 15, 2010

सृजन

शब्दों की भीड में
चुनता हूं
कुछ शब्दों को

आगे-पीछे
ऊपर-नीचे
रख-रखकर
तय करता हूं
भावों को

शब्दों की तरह ही
'भाव' भी होते हैं आतुर
लडने-झगडने को
कभी सुनता हूं
कभी नहीं सुनता

क्यॊं ! क्योंकि
करना होता है

सृजन
एक 'रचना' का

शब्द, भाव, मंथन
मंथन से ही
संभव है
सृजन
एक "रचना" का !

5 comments:

अक्षिता (पाखी) said...

बहुत बढ़िया लिखा आपने...पसंद आई आपकी रचना.

_______________
पाखी की दुनिया में- 'जब अख़बार में हुई पाखी की चर्चा'

आशीष/ ASHISH said...

Sach hee to hai...
Aisa hi hota hai!
Badhai!

sangeeta swarup said...

शब्द, भाव, मंथन
मंथन से ही
संभव है
सृजन
एक "रचना" का


सटीक और खूबसूरत अभिव्यक्ति....मेरे ब्लॉग पर आने का शुक्रिया

kshama said...

Kabhi,kabhi itni stabdh ho jati hun,ki, mujhe tppanee dene aati..!

कविता रावत said...

Sundar bharpurn rachna ke liye dhanyavad.