Saturday, July 17, 2010

मन ही मंदिर है !

मंदिर वह पवित्र स्थल जहां ईश्वर का वास होता है, इस धरा पर अनेक धर्म व अनेक ईश्वर हैं, प्रत्येक धर्म ने अपने अपने ईश्वर के लिये स्थान सुनिश्चित कर रखा है जिसे शाब्दिक भाषा में मंदिर, चर्च, मस्जिद, गुरुद्वारा इत्यादि के नाम से जाना जाता है।

यहां पर मैं उस ईश्वर की चर्चा करना चाहता हूं जो किसी धर्म विशेष का न होकर मानव जाति का है, मेरा सीधा-सीधा तात्पर्य मानव जाति अर्थात समाज से है, वो इसलिये जब मानव जन्म लेता है तब उसका कोई धर्म नही होता, वह जिस धर्म को मानने वाले परिवार में जन्म लेता है वह ही उसका धर्म हो जाता है, यह धर्म उसे विरासत में मिलता है।

यहां यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि मैं सभी धर्म को समान रूप से मानता हूं व सम्मान देता हूं लेकिन मैं मानव धर्म को प्राथमिक तौर पर सर्वोपरी मानता हूं, वो इसलिये तत्कालीन उपजे हालात व परिस्थितियों में मानव धर्म स्वमेव सर्वोपरी हो जाता है, किसी पीडित व दुखियारी की मदद के समय इंसान यह नही सोचता कि वह किस धर्म या संप्रदाय का है, यह ही मानव धर्म है।

मानव, मानव धर्म, मन ही मंदिर ... यहां मानव से तात्पर्य इंसान से, मानव धर्म से तात्पर्य इंसानियत से, मन ही मंदिर से तात्पर्य मानव के मन से है ... मानव का मन ही वह स्थल है जहां ईश्वर सकारात्मक सोच व ऊर्जा के रूप में वास करता है और मनुष्य को सतकर्म का मार्ग प्रशस्त करते हुये जीवन दर्शन कराता है ... मानवीय सोच, ऊर्जा व ईश्वर का वास मन रूपी मंदिर में होता है अर्थात मन ही मंदिर है !
जय गुरुदेव

( विशेष टीप :- यह लेख आचार्य जी ब्लाग पर प्रकाशित है।)

3 comments:

Rajendra Swarnkar said...

श्याम कोरी 'उदय' जी
मन ही मंदिर है ! सुंदर चिंतनपरक आलेख है , बधाई !
आप तो अंतर्जाल पर सक्रियता से पहले ही विद्यमान हैं ,
चिट्ठाजगत के माध्यम से आपका स्वागत करने का अवसर है
शस्वरं पर भी आपका हार्दिक स्वागत है , अवश्य आइएगा…

- राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं

अशोक बजाज said...

मानव मानव एक है , मानव का धर्म एक है . बहुत अच्छा .-- अशोक बजाज

संगीता पुरी said...

इस नए ब्‍लॉग के साथ आपका हिंदी चिट्ठाजगत में स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!