Wednesday, June 2, 2010

शेरों का सफ़र

‘उदय’ तेरे शहर में, हसीनों का राज है
तुम भी हो बेखबर, और हम भी हैं बेखबर ।
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कहाँ से चले थे, कहाँ आ गये हम
हमें न मिले वो, जो कश्में भुला गये ।
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चाहें तो सारी दुनिया भुला सकते हैं
न चाहें तो कैसे भुलाएँ हम तुम्हे।

6 comments:

रचना दीक्षित said...

बहुत सुन्दर बातें, मन को छू गयीं

आचार्य जी said...

आईये जानें ..... मन ही मंदिर है !

आचार्य जी

Rahul said...

चाहें तो सारी दुनिया भुला सकते हैं
न चाहें तो कैसे भुलाएँ हम तुम्हे।
....it is so true

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

बहुत ही प्यारे शेर हैं, शुक्रिया।.
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रूपसियों सजना संवरना छोड़ दो?
मंत्रो के द्वारा क्या-क्या चीज़ नहीं पैदा की जा सकती?

आचार्य जी said...

आईये जानें .... मन क्या है!

आचार्य जी

योगेन्द्र मौदगिल said...

wahwa...uday ji...wah..