Sunday, June 6, 2010

शेरों की दौड

‘उदय’ तेरी नजर को, नजर से बचाए,
जब-भी उठे नजर, तो मेरी नजर से आ मिले।
(नजर = आँखें , नजर = बुरी नजर/बुराई)

कौन जाने, कब तलक, वो भटकता ही फिरे
आओ उसे हम ही बता दें ‘रास्ता-ए-मंजिलें’ ।

क्यों शर्म से उठती नहीं, पलकें तुम्हारी राह पर
फिर क्यों राह तकते हो, गुजर जाने के बाद।

3 comments:

Rahul said...

क्यों शर्म से उठती नहीं, पलकें तुम्हारी राह पर
फिर क्यों राह तकते हो, गुजर जाने के बाद।
.....u caught the act..:)

arvind said...

कौन जाने, कब तलक, वो भटकता ही फिरे
आओ उसे हम ही बता दें ‘रास्ता-ए-मंजिलें’ ।
......bahut hi damadaar. kitana accha hota ki ham rasa-e-manjile bataayen....ek sher......nashaa pilake girana to sab ko aataa hai...majaa to tab hai ki girate ko tham le shaaki.

Babli said...

वाह वाह! क्या बात है! शानदार, ज़ोरदार और धमाकेदार प्रस्तुती!