Wednesday, June 30, 2010

'छोटी सी ज्वाला'

एक समय था
जल रही थी
ऊंच-नीच की
'छोटी सी ज्वाला'
कुछ लोगों ने
आकर उस पर
जात-पात का
तेल छिडक डाला

भभक-भभक कर
भभक उठी
वह 'छोटी सी ज्वाला'
फ़िर क्या था
कुछ लोगों ने
उसको अपना
हथियार बना डाला

न हो पाई मंद-मंद
वह 'छोटी सी ज्वाला'
अब गांव-गांव, शहर-शहर
हर दिल - हर आंगन में
दहक रही है 'छोटी सी ज्वाला' ।

9 comments:

स्वाति said...

bahut achhi aur sateek lagi aapki yah kavita..

Divya said...

अब गांव-गांव, शहर-शहर
हर दिल - हर आंगन में
दहक रही है 'छोटी सी ज्वाला' ।

Sundar rachna !

hem pandey said...

एक छोटी सी ज्वाला ही विकराल रूप ले लेती है.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सटीक.....अब यह छोटी कहाँ रही ? विकराल रूप ले लिया है

अनामिका की सदाये...... said...

छोटी सी ज्वाला अंगारा बन गयी ...सुंदर प्रस्तुति.

हर्षिता said...

सुन्दर रचना,सही नपे तुले शब्दों का प्रयोग किया गया है।

हर्षिता said...

सुन्दर रचना,सही नपे तुले शब्दों का प्रयोग किया गया है।

हर्षिता said...

सुन्दर रचना,सही नपे तुले शब्दों का प्रयोग किया गया है।

हर्षिता said...

सुन्दर रचना,सही नपे तुले शब्दों का प्रयोग किया गया है।