Sunday, August 8, 2010

क्या हम मन के गुलाम हैं !

मनुष्य का मन जिसकी शक्ति अपार है, मन की मंथन क्रिया से ही आधुनिक अविष्कार हुए हैं और होते ही जा रहे हैं, मन कभी इधर तो कभी उधर, कभी इसका तो कभी उसका, मन हर पल चंचल स्वभाव से ओत-प्रोत रहता है, पल में खुश तो पल में नाराज।

कहने को तो हम यह ही कहते हैं कि जो हम चाहते हैं वह ही मन करता है, पर हम कितने सही हैं, कहीं ऎसा तो नहीं ये हमारा भ्रम है कि मन हमारी मर्जी के आदेश पर काम करता है, कहीं ऎसा तो नहीं हम स्वयं ही मन के गुलाम हैं जो मन कहता है वह करते हैं जो उसे पसंद है वह करने को आतुर रहते हैं।

यह मनन करने योग्य है, सुबह से उठकर रात के सोने तक क्या हम वह ही करते हैं जो मन कहता जाता है, चाय, दूध, नाश्ता, पान, गुटका, जूस, मदिरा, वेज, नानवेज, प्यार, सेक्स, दोस्ती, दुश्मनी, चाहत, नफ़रत ... संभवत: वह सब करते हैं जो मन कहता जाता है।

जरा आप विचार करें, कितने बार ऎसा हुआ है कि आपने कुछ कहा हो और मन ने किया हो, शायद बहुत ही कम या ऎसा हुआ ही न हो, जरा बैठ के ठंठे दिमाग से सोचिये ... कहीं आप मन के गुलाम तो नहीं हैं !

जय गुरुदेव

( विशेष टीप :- यह लेख आचार्य जी ब्लाग पर प्रकाशित है।)

3 comments:

Udan Tashtari said...

विचारणीय!

ajay saxena said...

विचारणीय पोस्ट

परमजीत सिँह बाली said...

विचारणीय पोस्ट|