Sunday, August 29, 2010

सत्य-अहिंसा

सत्य-अहिंसा के पथ पर
आगे बढने से डरता हूं
कठिन मार्ग है मंजिल तक
रुक जाने से डरता हूं

हिंसा रूपी इस मंजर में
कदम पटक कर चलता हूं
कदमों की आहट से
हिंसा को डराते चलता हूं

झूठों की इस बस्ती में
फ़ंस जाने से डरता हूं
'सत्य' न झूठा पड जाये
इसलिये "कलम" दिखाते चलता हूं

सत्य-अहिंसा के पथ पर
आगे बढने ......................।

4 comments:

Akhtar Khan Akela said...

uday bhaayi bhut khub aap dre nhin jit aapke qdmon men he is vqt aek sher yaad aata he
yeh jhuton mkkaaron ki mhfil he
sch bole to tum bhi nikaale jaaoge .
akhtar khan akela kota rajsthan

arvind said...

badhiya kavita....satya our ahinsa ke raste par chalane se yadi darane lage to desh kaa kyaa hoga...?

S.M.HABIB said...

कलम के सिपाही गर डरने लगेंगे,
देश के सिपाही फिर कैसे लड़ेंगे???

vibha rani Shrivastava said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 30 जनवरी 2016 को लिंक की जाएगी ....
http://halchalwith5links.blogspot.in
पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!