Monday, August 16, 2010

शेर : मंजिलें

पीछे पलट के देखने की फुर्सत कहाँ हमें
कदम-दर-कदम हैं मंजिलें बडी ।

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हम जानते हैं तुम, मर कर न मर सके
हम जीते तो हैं, पर जिंदा नही हैं।

4 comments:

वाणी गीत said...

मर कर ना मरना ...
जीना ही कौन जिन्दा होना ...
वाह !

शहरोज़ said...

हम जानते हैं तुम, मर कर न मर सके
हम जीते तो हैं, पर जिंदा नही हैं।

क्या बात है श्याम भाई !! हक है हक है !
हमज़बान का लिंक तो अपने यहाँ दें ख़ुशी होगी! अपन तो बहुत पहले आपको शामिल कर चुके हैं.

हमज़बान यानी समय के सच का साझीदार
पर ज़रूर पढ़ें:
काशी दिखाई दे कभी काबा दिखाई दे
http://hamzabaan.blogspot.com/2010/08/blog-post_16.html

संजय कुमार चौरसिया said...

bahut khoob, udayji

http://sanjaykuamr.blogspot.com/

Udan Tashtari said...

बहुत बेहतरीन!